
⭐⭐💞💞💞⭐⭐
😢था कितना भयावह वो दृष्य😢
……वो जब दिन के उजालो मे भी…..
…..अंधियारों का विष…..
…..रात के अंधेरो मे भी…..
जिस रोशनी को न कभी दूर खुद से,
दुश्मन वही मेरी बनती जा रही थी !
रहती थी भयभीत मै जिन अंधियारो से,
मेरी किस्मत मुझे वही ढकेलती जा रही थी,
…..ना किसी से कुछ कह सकी …..
पर अंदर ही अंदर मै टुटती जा रही थी
अविस्मरणीय है वो यादे चार दिवारों कि ,
जहाँ दूर मै खुद के ही अस्तित्व से होती जा रही थी!!
🍁#Sansकृति ✍
⭐⭐💞💞💞⭐⭐